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शारीरिक विकास Physical Development

कुण्डू तथा टूट ने स्पष्ट किया है-"शारीरिक अभिवृद्धि से अभिप्राय है, शरीर के विभिन्न अंग का विकास और उनकी कार्यक्षमता। जन्म के क्षण (समय) से लेकर मृत्युपर्यन्त व्यक्ति निरन्तर बदलता रहता है। यह बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक कभी भी स्थिरता की स्थिति में नहीं होता और वह प्रौढ़ावस्था को ग्रहण करता है। फिर भी परिवर्तन का अन्त नहीं होता बल्कि वह धीमी गति से होता रहता है। इस प्रकार विकास एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसका प्रारम्भ जन्म से पूर्व ही हो जाता है। जो भी हो, जीवन के शुरू के वर्षों में शारीरिक परिवर्तन की मात्रा में तीव्रता रहती है और स्तर में निश्चितता प्रत्येक शारीरिक परिवर्तन पहले के परिवर्तन पर आश्रित होता है और बदले में होने वाले परिवर्तन को प्रभावित करता है।"

मानव शरीर का विकास गर्भावस्था से प्रारम्भ होता है। गर्भावस्था के विकास को जन्म पूर्व शारीरिक विकास भी कहा जा सकता है। माना तो यह भी जाता है कि मानव के विकास की आधारशिला गर्भावस्था में ही रख दी जाती है। बालक के शैक्षिक विकास में शारीरिक विकास का महत्वपूर्ण स्थान होता है। बालक का शारीरिक विकास उसके व्यवहार को प्रभावित करता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शारीरिक विकास व्यवहार के निम्न चार क्षेत्रों को प्रभावित करता है:-

1. स्नायु मंडल (Nervous System) - स्नायु मंडल के विकास के साथ बुद्धि विकास में वृद्धि होती है। इससे उसके व्यवहार को एक नया रूप मिलता है। बालक का संवेगात्मक व्यवहार उसकी विभिन्न परिस्थितियों को समझने की योग्यता से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है। वह जिस सामाजिक अनुमोदन का आनन्द प्राप्त करता है। उसका सम्बन्ध दूसरों के विचारों, भावों और संवेगों को समझने की योग्यता से सम्बन्धित होता है।

2. माँसपेशियों में वृद्धि (Growth Muscles)-माँसपेशियों की वृद्धि होने के साथ, उसकी शक्ति में विकास होता है, जो कि बालक की क्रियाशीलता में तथा उन क्रियाओं में दिखाई देती है जो परिवर्तित होती रहती है। विकास की सभी अवस्थाओं में बालक के खेल-कूद माँसपेशीय विकास पर निर्भर होते हैं। 

3. अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands) - अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के कार्यों में परिवर्तन होने से नवीन परिवर्तित व्यवहारों का प्रकाशन होता है।

4. सम्पूर्ण शारीरिक ढाँचा (Total Physical Structure)- सम्पूर्ण शारीरिक ढाँचे में परिवर्तन। से अर्थात् उसकी शारीरिक रचना, लम्बाई, भार, शारीरिक अनुपात और सामान्य शारीरिक रूप आदि बालक के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। शरीर का विकास अच्छे स्वास्थ्य पर निर्भर होता है। स्वस्थ व्यक्ति ही मन के साथ अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है। अतः यह कहा जा सकता है कि शारीरिक विकास और स्वास्थ्य का व्यक्ति के व्यवहार पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

शारीरिक विकास के नियम (LAWS OF PHYSICAL DEVELOPMENT)

शारीरिक विकास निम्नलिखित नियमों के अनुसार होता है:-

1. मस्तकाघोमुखी विकास का नियम (Law of Cephalocaudal Development)- यह नियम शारीरिक विकास की दिशा को निर्देशित करता है। इस नियम के अनुसार पहले सिर के भाग और फिर क्रमश: घड़, हाथों और पैरों का विकास होता है।

2. विकास चक्र का नियम (Law of Cyclic Development)- मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि सम्पूर्ण मानव विकास की प्रक्रिया निम्नलिखित चार चक्रों में होती है

I. प्रथम चक्र जन्म से 2 वर्ष तक

II. द्वितीय चक्र : 2 से 11 वर्ष तक 

III. तृतीय चक्र : 11 से 15 वर्ष तक

IV. चतुर्थ चक्र 15 से 18 वर्ष तक।

प्रथम चक्र में शारीरिक विकास बड़ी तीव्रता से होता है। द्वितीय चक्र में विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रहती है। तृतीय चक्र में विकास की गति पुनः तीव्र हो जाती है और चतुर्थ चक्र में विकास की गति पुनः धीमी हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि शारीरिक विकास एक समान गति से नहीं होता है। विकास की यह गति पृथक् आयु अन्तराल में भिन्न-भिन्न होता है।

हरलॉक के अनुसार-"विकास लयात्मक होता है, नियमित नहीं।"

"Growth in rythmic not regular." - Hurlock

विकास-चक्रों की तीव्रता और मन्दता का एक क्रम होता है। शारीरिक विकास के ये चक्र सभी बालकों में एक निश्चित समय पर प्रकट नहीं होते हैं। बालकों में व्यक्तिगत भिन्नताएँ होने के कारण विकास-चक्रों की गति तथा अन्तराल में अन्तर पाया जाता है। विभिन्न शारीरिक अंगों के विकास की गति भी विभिन्न अवस्थाओं में एक समान नहीं रहती है। थॉमसन का विचार है-"मानव-शरीर एक समग्र के रूप में विकास नहीं करता, न ही सभी

दिशाओं में एक साथ विकसित होता है।" "The human body does not grow as a whole, nor it grows in all directions at once." -Thompson

सभी शारीरिक अंगों का विकास अलग-अलग नियमों के अनुसार होता है। शरीर के कुछ अंग का विकास एक निश्चित अवस्था में ही होता है।

शारीरिक विकास की विशेषताएँ (CHARACTERISTICS OF PHYSICAL DEVELOPMENT)

बालक का शारीरिक विकास मुख्यतः दो प्रकार से होता है :-

I. शारीरिक रचना का विकास- इसके अन्तर्गत शरीर का आकार, भार, ऊँचाई, शारीरिक अंगों का शरीर के साथ अनुपात, हड्डियाँ, दाँत आदि का विकास सम्मिलित है।

II. शारीरिक क्रिया विकास (Physiological Development)- इसके अन्तर्गत तंत्रिका तंत्र (Nervous System), हृदय (Heart) और रुधिर तन्त्र (Circulatory System), श्वसन-तन्त्र (Respiratory System), पाचन तंत्र (Digestive System), माँसपेशियाँ (Muscles), अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि का विकास सम्मिलित है।

शैशवावस्था में शारीरिक विकास (PHYSICAL DEVELOPMENT DURING INFANCY)

शैशवावस्था जन्म से लेकर 6 वर्ष तक मानी जाती है। इस अवस्था को दो भागों में बाँटा जा सकता है :-

1. प्रथम भाग: जन्म से 3 वर्ष तक,

2 द्वितीय भाग : 3 से 6 वर्ष तक।

प्रथम भाग जन्म से लेकर तीन वर्ष तक होता है। वास्तव में इसी काल में बालक शिशु कहा जा सकता है। 'Infant' शब्द का अर्थ नहीं बोलने वाला होता है। कोई नवजात बालक लगभग तीन वर्ष तक अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने योग्य नहीं हो पाता है। द्वितीय भाग तीन वर्ष की आयु के बाद वह भली प्रकार बोलना सीख लेता है, इसलिए Infancy की अवस्था तीन वर्ष बाद समाप्त हो जाती है। सुविधा तथा व्यवहार की दृष्टि से 6 वर्ष तक की आयु को शैशवावस्था में रखा गया है। उक्त तीन वर्षों के दौरान बालक का शारीरिक विकास बहुत तीव्र गति से होता है। अगले तीन वर्ष में भाषा की गति तुलनात्मक रूप से कुछ मन्द पड़ जाती है। अतः इसे मन्द गति से विकास का काल कहा जा सकता है। शारीरिक विकास निम्नलिखित प्रकार से होता है

1. आकार (Size)-जन्म के समय शिशु की लम्बाई लगभग 20 इंच होती है। प्रायः बालक बालिका से 1/2 इंच अधिक लम्बे होते हैं। प्रथम वर्ष में शिशु की लम्बाई लगभग 27 या 28 इंच, दूसरे वर्ष में 31 या 33 इंच और 6 वर्ष तक लगभग 40 या 44 इंच हो जाती है।

2. भार (Weight)-जन्म के समय बालक का भार बालिकाओं से अधिक होता है। नवजात शिशु का भार 6 से 8 पौंड तक होता है। प्रथम 6 मास में शिशु का भार दुगुना और एक वर्ष में तिगुना हो जाता है। तीन वर्ष में लगभग 20 या 25 पौंड और छठे वर्ष तक 40 पौंड हो जाता है।

3. माँसपेशियाँ (Muscles)- शिशु की माँसपेशियों का भार उसके शरीर के कुछ भार का 23% होता है। धीरे-धीरे यह भार बढ़ता है। उसकी भुजाओं का विकास तीव्र गति से होता है। प्रथम दो वर्ष में भुजाएँ दुगुनी और टांगें लगभग डेढ़ गुना हो जाती हैं। 6 वर्ष की आयु तक उनकी माँसपेशियों में लचीलापन आ जाता है। 

4. हड्डियाँ (Bones)- नवजात शिशु की हड्डियाँ छोटी, कोमल और लचीली होती हैं। हड्डियों की संख्या 270 होती है। हड्डियाँ कैल्सियम, फॉस्फोरस तथा अन्य खनिज पदार्थों की सहायता से मजबूत होती जाती हैं। इसे अस्थि करण (Ossification) की प्रक्रिया कहते हैं। बालक की अपेक्षा बालिका को अस्थिकरण प्रक्रिया जल्दी होती है।

5. दाँत (Teeth)-जन्मकाल से शिशु के दाँत नहीं होते। लगभग सातवें मास से दाँत निकलना प्रारम्भ होते हैं। ये अस्थायी दाँत होते हैं। इनको दूध के दाँत कहा जाता है। एक वर्ष की आयु तक इनकी संख्या आठ हो जाती है तथा लगभग चार वर्ष की आयु तक दूध के सब दाँत निकल आते हैं। इसके बाद ये दाँत गिर जाते हैं और पाँचवें या छठे वर्ष की आयु में स्थायी दाँत निकलने लगते हैं।

6. सिर व मस्तिष्क (Head and Brain)-नवजात शिशु का सिर शरीर की अपेक्षा बड़ा होता है। जन्म के समय सिर की लम्बाई उसके शरीर की कुल लम्बाई की 1/4 होती है। प्रथम दो वर्षों में सिर बहुत तेजी से बढ़ता है। उसके बाद विकास की गति धीमी हो जाती है। जन्म के समय मस्तिष्क का भार लगभग 350 ग्राम होता है। 6 वर्ष की आयु तक यह बढ़कर 1260 ग्राम हो जाता है। वयस्क मस्तिष्क का भार 1400 ग्राम बताया जाता है। इससे स्पष्ट है कि शैशवावस्था में मस्तिष्क के भार की वृद्धि तीव्र गति से होती है।

7. शिशु के आन्तरिक अंगों का विकास (Development of Internal Organs)-जन्म के बाद शरीर के आन्तरिक अंगों का विकास होता है। इसमें पाचक अंग (Digestive Organs), फेफड़े (Lungs), माँसपेशियाँ (Muscles), स्नायुमंडल (Nervous System), रक्त संचार अंग (Circulatory Organs), उत्पादक अंग (Productive Organs) तथा ग्रन्थियों का क्रमशः विकास होता है।

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास (PHYSICAL DEVELOPMENT DURING CHILDHOOD)

बाल्यावस्था को 6 से 12 वर्ष तक की आयु तक माना जाता है। इस अवस्था को दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

I. प्रथम भाग : 6 से 9 वर्ष तक

II. द्वितीय भाग : 9 से 12 वर्ष तक

प्रथम भाग में विकास को गति तेज होती है तथा द्वितीय भाग में गति कुछ मन्द पड़ जाती है किन्तु शरीर में दृढ़ता आनी शुरू हो जाती है। इस आयु में शारीरिक परिवर्तन निम्न प्रकार से होते हैं 

1. लम्बाई या आकार (Height or Size)- लम्बाई में वृद्धि की दृष्टि से यह काल विशेष रूप से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इस अवस्था में लम्बाई बढ़ने की दर 2-3 इंच प्रतिवर्ष रहती है। 6 से 9 वर्ष तक की आयु तक बालिकाओं की लम्बाई बालकों की अपेक्षा कम रहती है। 10वें वर्ष में दोनों की लम्बाई लगभग समान हो जाती है तथा 12 वर्ष आने तक बालिकाएँ बालकों से अधिक लम्बी हो जाती है।

2. भार (Weight)- लम्बाई की भाँति भार में भी बालिकाएँ 9 वर्ष तक बालकों से कम रहती है तथा 10 से 12 वर्ष के दौरान बालकों से अधिक हो जाती है।

3. मस्तिष्क व सिर (Brain and Head)-इस अवस्था में सिर का विकास तो होता है किन्तु शरीर और सिर का अनुपात वयस्क के शरीर और सिर के अनुपात की समानता की ओर प्रवृत्त होने लगता है। शैशवावस्था के अन्त तक मस्तिष्क का विकास वयस्क मस्तिष्क का 90% होता है जो बाल्यावस्था में अन्त तक बढ़कर 95% हो जाता है। इस प्रकार बाल्यावस्था के दौरान मस्तिष्क का पर्याप्त विकास हो जाता है।

4. माँसपेशियाँ (Muscles) बाल्यावस्था में माँसपेशियों का विकास मन्द गति से होता है। | वर्ष की आयु में माँसपेशियों का भार शरीर के कुलभर का 27% होता है जो 12 वर्ष में बढ़कर 33% हो जाता है।

5. धड़ का विकास (Development of Trank Part of the Body)- बाल्यावस्था में बालक एवं बालिकाओं के घड़ का विकास महत्व रखता है। इस आयु में शरीर बलिष्ठ, पुष्ट तथा शक्तिशाली होने लगता है जिससे बालक अपने अंगों के संचालन पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं। बालकों के कन्नों चौड़े होने लगते हैं तथा कुल्हे पतले हो जाते हैं। बालिकाओं के कंधे पतले हो जाते हैं तथा कल्हे चौड़े हो जाते हैं।

6. हाथ व पैर (Hands and Legs)- बाल्यावस्था में बालकों के पैर लम्बे व सौंधे हो जाते हैं। तथा बालिकाओं के पैर अन्दर की और कुछ झुकाव ले लेते हैं। भुजाएँ भी लम्बी होने लगती हैं। 

7. दाँत (Teeth)-बाल्यावस्था के आरम्भ में दूध के दाँत गिरने लगते हैं और नए स्थायी दाँत आने प्रारम्भ होने लगते हैं। लगभग 12-13 वर्ष में सभी दाँत आ जाते हैं। सामान्यतया दाँतों की संख्या 27 28 होती है। बालिकाओं के दाँत बालकों की तुलना में कुछ जल्दी निकल आते हैं। दाँत चहरे की आकृति में स्थायित्व लाते हैं और उसे सुन्दर बनाते हैं।

8. यौन अंगों का विकास (Development of Sex Organs)-बालकों तथा बालिकाओं दोनों के प्रजनन अंगों का विकास भी बाल्यावस्था में होने लगता है किन्तु बालकों में यह विकास धीमी गति से होता है। 11-12 वर्ष तक आते-आते बालिकाओं के यौन अंगों का विकास तीव्र गति पकड़ लेता है। 

9. हृदय गति (Heart beating)- शैशवावस्था की तुलना में बाल्यावस्था में हृदय के धड़कनों की गति कम हो जाती है। 18 वर्ष के बालकों का हृदय प्रति मिनट 85 बार धड़कता है।

किशोरावस्था में शारीरिक विकास (PHYSICAL DEVELOPMENT DURING ADOLESCENCE)

किशोरावस्था 12 से 18 वर्ष तक होती है। किशोरावस्था में बालक तथा बालिकाओं का विकास काफी तीव्र गति से होता है। बालकों में तीव्रतम विकास का समय 14 से 15 वर्ष तथा बालिकाओं में ।। से 13 वर्ष होता है। किशोरावस्था में शारीरिक विकास निम्न प्रकार से होता है:-

1. भार (Weight)-किशोरावस्था में किशोरों का भार किशोरियों की अपेक्षा अधिक बढ़ता है। इस अवस्था के अन्त में किशोर का भार किशोरी से 25 पौण्ड अधिक होता है।

2. ऊँचाई (Height)-किशोरावस्था में किशोर तथा किशोरियों की ऊँचाई में तीव्रता के साथ वृद्धि होती है। 15 वर्ष की आयु में किशोर तथा किशोरियों की ऊँचाई लगभग समान रहती है। 18 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते किशोरों की लम्बाई किशोरियों से 6-7 सेमी. अधिक हो जाती है। किशोरी 16. वर्ष की आयु में अपनी अधिकतम ऊँचाई प्राप्त कर लेती है, किशोरों की लम्बाई 18 वर्ष के बाद भी बढ़ती रहती है।

3. सिर व मस्तिष्क (Head and Brain)- सिर एवं मस्तिष्क का विकास इस अवस्था में भी होता रहता है। 15 या 16 वर्ष की आयु तक सिर का लगभग पूर्व विकास हो जाता है। मस्तिष्क का भार 1200 और 1400 ग्राम के बीच होता है। 

4. हड्डियाँ (Bones)- इस अवस्था में अस्थिकरण को प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। कुछ छोटी-मोटी अस्थियाँ आपस में जुड़ जाती है।

5. दाँत (Teeth) - किशोरावस्था के आरम्भ तक बालकों और बालिकाओं के सभी स्थायी दाँत निकल आते हैं, प्रज्ञादन्त (Wisdom Teeth) भी इस अवस्था के अन्त में अथवा प्रौढ़ावस्था के प्रारम्भ में निकलते हैं।

6. मांसपेशियाँ (Muscles)- किशोरावस्था में माँसपेशियों का विकास तीव्रता से होता है। 12 वर्ष की आयु में माँसपेशियों का भार शरीर के कुल भार का 33% और 16 वर्ष की आयु में लगभग 44% होता है। माँसपेशियों के गठन में दृढ़ता आ जाती है। सभी अंग सुडौल और पुष्ट दिखाई देने लगते हैं।

शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS INFLUENCING PHYSICAL DEVELOPMENT)

1. वंशानुक्रम (Heredity)- वंशानुक्रम या आनुवंशिकता शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाला सर्वप्रमुख कारक है। बेन्डिक्ट के अनुसार- "आनुवंशिकता माता-पिता के जैविक गुणों का सन्तति हस्तान्तरण है।"

"Heredity is the transmission of traits from parents to of spring." -Ruth Bendict 

प्राणी की उत्पत्ति माता-पिता के बीज कोशों के संयोग से होती है। जैव वैज्ञानिकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने अपने विभिन्न अध्ययनों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि माता-पिता के शील-गुणों का उनकी संतान पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ माता-पिता की संतान प्रायः स्वस्थ होती है और रोगी तथा निर्बल माता-पिता की संतान प्रायः निर्बल और रोगी होती है। वंशानुक्रम या आनुवंशिकता को शारीरिक विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

फ्रॉसिस गाल्टन के अनुसार-"मानव विकास में पोषण की अपेक्षा आनुवांशिकता सर्वाधिक सशक्त कारक है।" "Heredity is a far more powerful agent in human development than nature." -Francis Galton

2. वातावरण (Environment) – मनोवैज्ञानिक रॉस के अनुसार-"कोई बाह्य शक्ति जो हमें प्रभावित करती है, वातावरण है।"

"Environment is any external force which influence us." - Ross 

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से किसी व्यक्ति का पर्यावरण वातावरण उन सब उत्तेजनाओं का योगफल है। जो उसे गर्भाधान से मृत्युपर्यन्त प्राप्त होती है। वातावरण के मुख्यतः तीन आयाम होते हैं-भौगोलिक वातावरण, सामाजिक वातावरण तथा मानसिक वातावरण अनुकूल वातावरण शारीरिक विकास पर अनुकूल प्रभाव डालता है जबकि प्रतिकूल वातावरण का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। दूसरे शब्दों में जलवायु, पर्याप्त प्रकाश, स्वच्छ मनोरम वातावरण बालक-बालिकाओं के शारीरिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

3. पौष्टिक भोजन (Nutritive Diet)- बालक का स्वस्थ एवं स्वाभाविक विकास विशेष रूप से पौष्टिक तथा संतुलित आहार पर निर्भर होता है। इस सम्बन्ध में सोरेन्सन ने कहा है-"पौष्टिक भोजन थकान का प्रबल शत्रु और शारीरिक विकास का परम मित्र है।" विकास पर नियमित

4. नियमित दिनचर्या (Regulated Routine) - बालक के शारीरिक दिनचर्या का प्रभाव पड़ता है। उसके खाने, पीने, पढ़ने, लिखने, सोने आदि के लिए समय निश्चित होना चाहिए। अतः स्वस्थ एवं स्वाभाविक विकास के लिए बालक में आरम्भ से ही नियमित जीवन बिताने की आदत डालनी चाहिए।

5. निद्रा व विश्राम (Step and Rest) शरीर के स्वस्थ विकास के लिए निद्रा और विश्राम आवश्यक है। अतः शिशु को अधिक से अधिक सोने देना चाहिए। तीन या चार वर्ष के शिशु के लिए 12 घण्टे की निद्रा आवश्यक है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था में क्रमशः 10 और 8 घण्टे की निद्रा पर्याप्त होती है। बालक को इतना विश्राम मिलना आवश्यक है, जिससे कि उसकी क्रियाशीलता से उत्पन्न होने वाली थकान पूरी तरह से दूर हो जाए, क्योंकि थकान उसके विकास में बाधक सिद्ध होती है।

6. व्यायाम, खेलकूद व मनोरंजन (Exercise, Games and Entertainment) सदैव काम करते रहना तथा खेलकूद न करना, मनोरंजन के अवसर न मिलना बालक के विकास को मन्द कर देता है। इस प्रकार शारीरिक विकास के लिए व्यायाम और खेलकूद अपरिहार्य होते हैं। इसके साथ मनोरंजन एवं मनोविनोद भी शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

7. प्रेम (Love)- बालक के शारीरिक विकास पर माता-पिता तथा अध्यापक के व्यवहार का भी काफी असर पड़ता है। यदि बालक को इनसे प्रेम और सहानुभूति नहीं मिलती है तो वह काफी दुःखी रहने लगता है जिससे उसके शरीर का संतुलित और स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता है। उसका विकास कुंठित हो जाता है। 

8. सुरक्षा (Security)- शिशु या बालक के सम्यक् विकास के लिए उसमें सुरक्षा की भावना अति आवश्यक है। इस भावना के अभाव में वह भय का अनुभव करने लगता है और आत्म-विश्वास खो बैठता है। ये दोनों बातें उसके विकास को अवरुद्ध कर देती हैं। 

9. पारिवारिक परिवेश (Family Environment)- परिवार ममता का स्थल होता है। ममता, मैत्री, वात्सल्य, प्रफुल्लता, स्नेह, सहयोग, संरक्षण, सहानुभूति परिवार में हो सुलभ होते हैं। अतः उपयुक्त शारीरिक विकास के लिए उपयुक्त पारिवारिक परिवेश नितान्त आवश्यक हो जाता है।

10. अन्य कारक (Other Factors)- शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले कुछ अन्य कारक भी हैं, जैसे-गर्भवती का स्वास्थ्य, रोग अथवा दुर्घटना के कारण उत्पन्न शारीरिक विकृतियाँ, जलवायु, सामाजिक परम्पराएँ, परिवार की आर्थिक स्थिति, परिवार का रहन-सहन, विद्यालय और शिक्षा आदि।

अध्यापकों के लिए शारीरिक विकास के निहितार्थ (IMPLICATIONS OF PHYSICAL DEVELOPMENT FOR TEACHERS)

वृद्धि और विकास के सभी आयाम एक-दूसरे से सम्बद्ध होते हैं। अध्यापक का कर्त्तव्य होता है कि वह अपने विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास में अपना पूर्ण सहयोग दे। व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास करना शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा के इस उद्देश्य को बालक प्राप्त करने का सबसे बड़ा दायित्व अध्यापक का होता है। व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास तभी हो सकता है जब बालक का शारीरिक विकास उचित ढंग से तथा उचित रूप में हो। अध्यापक अपने उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक तभी निभा सकता है जब उसे बालक के स्वाभाविक शारीरिक विकास का ज्ञान हो। क्रो एवं क्रो के अनुसार-"बालक सर्वप्रथम शरीरधारी प्राणी है। उसकी शारीरिक रचना उसके व्यवहार और दृष्टिकोणों के विकास का आधार है। अतः उसके शारीरिक विकास के रूपों का अध्ययन आवश्यक है।"

"The child is first and foremost a physical being. This physical constitution is basic to the development of his attitudes and behaviour. Hence, it is necessary to study the patterns of his physical growth." -Crow and Crow

प्रशिक्षण के स्तर पर ही अध्यापकों को शारीरिक विकास के विभिन्न मुद्दों, कारकों, विशेषताओं का ज्ञान दिया जाना चाहिए। अध्यापक को स्पष्ट होना चाहिए कि शारीरिक विकास ही सामाजिक संवेगात्मक, मानसिक और नैतिक विकास का आधार होता है। शारीरिक विकास से परिचित अध्यापक प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में बालक के शारीरिक विकास और शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने में अपनी भूमिका सफलता से निभा सकता है। अध्यापकों के लिए शारीरिक विकास के निहितार्थों को निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है

1. अध्यापक को चाहिए कि कक्षा तथा विद्यालय में कारकों को नियन्त्रित करे जो विद्यार्थी के शारीरिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डाल सकते हैं। 

2. सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों तथा वातावरण से शारीरिक विकास का गहरा सम्बन्ध होता है। अध्यापक का कार्य है कि वह बालक में उन कौशलों का विकास करे जिससे वह अपनी सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों से समंजन कर सके।

3. अध्ययन के नियमों की जानकारी बालक को अवश्य देनी चाहिए, अध्ययन की उत्तम आदते बालक के शारीरिक विकास में सहयोगी होती हैं।

4. खेल और व्यायाम के प्रति विद्यार्थियों की रुचि और उत्साह जगाने का कार्य अध्यापक को करना चाहिए।

5. माता-पिता से सम्पर्क कर बालक की नियमित दिनचर्या, निद्रा व विश्राम, प्रेम व सुरक्षा आदि के बारे में निर्देशित करना चाहिए, इससे बालक के शारीरिक विकास और स्वास्थ्य के प्रति अध्यापक अपनी परोक्ष भूमिका निभा सकता है।

6. अध्यापक को समय-सारणी का निर्माण, शिक्षण विधियों का चयन कक्षा के अन्दर तथा बाहर के विविध क्रियाकलापों का आयोजन, गृहकार्य प्रदान करना आदि शारीरिक विकास की अवस्थाओं के अनुरूप करना चाहिए।

7. अध्यापकों को व्यायाम, योग जैसे कार्यक्रमों को गम्भीरतापूर्वक आयोजित करना चाहिए। अक्सर पाया जाता है कि इस प्रकार के कार्यक्रमों को अध्यापक हल्के-फुल्के ढंग से सम्पादित करने का प्रयास करते हैं।

8. बालक के शारीरिक विकास में रुचियों, आदतों, आकांक्षाओं आदि की सन्तुष्टि का विशेष महत्व होता है। अध्यापक को ध्यान रखना चाहिए कि उसके द्वारा चयनित या नियोजित क्रियाओं से बालक की रुचियों, आदतों और आकांक्षाओं आदि को सन्तुष्टि प्राप्त हो सके।

9. दण्ड देते समय अध्यापक को ध्यान रखना चाहिए कि किस प्रकार का दण्ड उचित है। विचारपूर्वक दिया गया दण्ड बालक को शारीरिक हानि से सुरक्षित रखता प्रयास

10. अध्यापक को बालकों में वांछित व्यावहारिक एवं आदतीय परिवर्तन के लिए समग्र करना चाहिए। वांछित व्यवहार और आदतें बालक के शारीरिक विकास में सहयोगी होती हैं।

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