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सामाजिक विकास Social Development

जन्म के समय मनुष्य सामाजिक नहीं होता, जैसे जैसे उसका शारीरिक और मानसिक विकास होता जाता है, समाजीकरण का भी विकास होता है। जन्म के उपरान्त माँ की गोद से शिशु का जीवन आरम्भ होता है। 3-4 साल की अवस्था में शिशु घर से बाहर निकलता है और वह साथी बनाता है और अपने साथियों के साथ खेलना-कूदना, घूमना-फिरना पसन्द करता है। मनोवैज्ञानिक इस प्रवृत्ति को 'सामाजिकता' मानते हैं। समाजिकता की अपूर्व विशेषता के कारण मनुष्य अन्य वर्गों से भिन्न तथा उत्तम माना जाता है। वह समाज में रहकर जीना चाहता है और सामाजिक बन्धनों को बनाने तथा दूसरों के साथ समायोजन की चेष्टा करता है। सामाजिक विकास या समाजीकरण मानव वृद्धि और विकास की सम्पूर्ण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन समाजीकरण की प्रक्रिया से होकर गुजरता है।

सामाजिक विकास का अर्थ (MEANING OF SOCIAL DEVELOPMENT)

उस प्रक्रिया को सामाजिक विकास की प्रक्रिया माना जाता है जिसके द्वारा वह सामाजिक परम्पराओं और रूढ़ियों के अनुसार व्यवहार करता है तथा अन्य लोगों से सहयोग करना सीखता है। दूसरे शब्दों में सामाजिक विकास का अर्थ है-बालक का समाजीकरण करना। समाज में रहकर ही वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और अपनी जन्मजात शक्तियों और प्रवृत्तियों का विकास करता है। उसकी समस्त शक्तियों का विकास तथा आचरण व्यवहार का परिमार्जन और सामाजिक गुणों का विकास सामाजिक वातावरण में ही सम्भव है। समाज में रहकर ही दूसरों से सम्पर्क स्थापित करता है और धीरे-धीरे सामाजिक आदर्शों तथा प्रतिमानों का अनुकरण करना सीखता है। इस प्रकार सीखने और समायोजन करने की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। सामाजिकता विकास बालक में समायोजन की क्षमता उत्पन्न होती है। व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है और शिक्षा समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति अपने समाज की जीवनशैली को सीखता है। समाज के मूल्यों और विश्वासों में आस्था रखने लगता है। अपने समाज में अनुकूलन स्थापित करने की योग्यता को सामाजिक विकास कहते हैं।

हरलॉक के अनुसार-"सामाजिक विकास का अर्थ सामाजिक सम्बन्धों में परिपक्वता को प्राप्त करना है।"

"Social development means the attaining of maturity in Social relationship." - Herlock


सोरेन्सन के अनुसार-"सामाजिक अभिवृद्धि और विकास का तात्पर्य है-अपनी और दूसरों की उन्नति के लिए योग्यता वृद्धि।"

"By social growth and development we mean the increasing ability to get along well with oneself and others." - Sorenson


रॉस के अनुसार-"सहयोग करने वाले लोगों में हम भावना' का विकास और उनके साथ काम करने की क्षमता का विकास तथा संकल्प समाजीकरण कहलाता है।"

"The development of 'we feeling' in associates and the growth in their capacity and will to act together is called socialization." - Ross 


एफ. एफ. पावर्स के अनुसार-"सामाजिक विकास की परिभाषा प्रगतिशील सुधार के रूप में दी जा सकती है जो सुधार निर्देशित क्रिया के द्वारा व्यक्ति को अपने सामाजिक वंशानुगति के बोध में इस वंशानुगति के साथ उचित ढंग की संगति के परिवर्तनीय आचरण-प्रतिदर्श के निर्माण में होता है।" 

"Social development can be defined as the progressive improvement, through directed activity, of the individual is the comprehension of the social heritage and the formation of the flexible conduct patterns of reasonable confirmity with the heritage." F.S. Powers: 


फ्रीमैन एवं शौवल के अनुसार-"सामाजिक विकास सीखने की वह प्रक्रिया है जो समूह के स्तर, परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों को अपने अनुकूल अपने आपको ढालने तथा एकता, मेलजोल और पारस्परिक सहयोग की भावना भरने में सहायक होती है।"

"Social development is the process of learning to conform to group standards, mores and traditions and becoming imbued with a seuse of oneness, inter-communication and co operation." -Freeman and Showel


उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर सामाजिक विकास का संक्षेप में अर्थ है

1. दूसरों के विचारों की सहन शक्ति की क्षमता का विकास। 

II. दूसरों के साथ सहयोग की भावना का विकास।

III. दूसरों के सुख-दुःख को बाँटने की क्षमता का विकास।

IV. दूसरों के साथ मेल-मिलाप की भावना का विकास।

V सामाजिक मूल्यों एवं आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करने की क्षमता का विकास।

घर, परिवार, पड़ोस, मित्र-मंडली, विद्यालय, समुदाय, जनसंचार साधन तथा राजनीतिक और सामाजिक संस्थाएँ बालक के समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। बालक के सामाजिक विकास को शैक्षिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। आधुनिक समय में शिक्षा के एक प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति का सामाजिक विकास करना स्वीकार किया जाता है। अतः शिक्षा के द्वारा बालकों के न केवल शारीरिक व मानसिक विकास को प्रोत्साहित किया जाता है वरन् उनके सामाजिक विकास को भी सही दिशा प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है।

शैशवावस्था में सामाजिक विकास (SOCIAL DEVELOPMENT DURING INFANCY)

जन्म के समय शिशु सामाजिक प्राणी नहीं होता है। जैसे-जैसे उसका शारीरिक और मानसिक विकास होता है वैसे-वैसे उसका सामाजिक विकास भी होता है। शिशु के समाजीकरण की प्रक्रिया दूसरे व्यक्तियों के साथ उसके सम्पर्क से प्रारम्भ होती है। शैशवावस्था में शिशु का सामाजिक विकास जिस क्रम से होता है, उसे हरलॉक ने निम्नवत् प्रस्तुत किया है:-

आयु-अवधि (Duration of Age) सामाजिक व्यवहार का रूप (Pattern of Social Behaviour)
प्रथम माह शिशु किसी वस्तु को या व्यक्ति को देखकर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं करता है। तीव्र प्रकाश व ध्वनि के प्रति प्रतिक्रिया अवश्य करता है। वह रोने और नेत्रों को घुमाने की प्रतिक्रिया करता है।
दूसरा माह
शिशु आवाजों को पहचानने लगता है। जब कोई व्यक्ति उससे बात करता है या ताली बजाता है या खिलौना दिखाता है तो वह आवाज को सुनकर सिर घुमाता है तथा दूसरों को देखकर मुस्कराता है।
तीसरा माह शिशु अपनी माँ तथा परिवार के सदस्यों को पहचानने लगता है। जब कोई शिशु की ओर देखकर बात करता है या ताली बजाता है तो वह रोते-रोते चुप हो जाता है तथा उसकी ओर देखने लगता है।
चौथा माह शिशु पास आने वाले व्यक्ति को देखकर हँसता है, मुस्कराता है। जब कोई व्यक्ति उसके साथ खेलता है तो वह खेलता है, अकेला रह जाने पर प्रायः रोता है।
पाँचवाँ माह शिशु प्रेम व क्रोध में अन्तर समझने लगता है। दूसरे व्यक्ति के हँसने पर अथवा प्रसन्न होने पर वह भी हँसता है तथा किसी के नाराज होने पर अथवा डाँटने पर सहम जाता है तथा प्राय: रोने लगता है।
आठवाँ माह वह बोले जाने वाले शब्दों और हाव-भाव का अनुकरण करने लगता है।
एक वर्ष वह मना किए जाने वाले कार्यों को नहीं करता है।
सवा वर्ष बड़ों के साथ रहने व उनके व्यवहार का अनुकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगती है।
दो वर्ष वह बड़ों के साथ घर का कार्य करने लगता है। इस प्रकार वह परिवार का सक्रिय सदस्य बन जाता है।
दो और तीन वर्ष के बीच
सामाजिक विकास तीव्र गति से होता है। उसकी रुचि खिलौने से हटकर उसके साथ खेलने वाले साथियों से हो जाती है। वह खेलने के लिए साथी बनाने लगता है और उनसे सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करता है। उसके व्यवहार में परिवर्तन होने लगता है। उसके आत्मकेन्द्रित व्यवहार का समाजीकरण आरम्भ हो जाता है।
चौथा और पाँचवाँ वर्ष शिशु नर्सरी विद्यालय में प्रवेश लेता है, वह एक नई सामाजिक दुनिया में प्रवेश करता है और नए सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करता है।
पाँच वर्ष शिशु दूसरे बच्चों के सामूहिक जीवन से अनुकूलन करना, उनसे लेन-देन करना और अपने खेल के साथियों को अपनी वस्तुओं में साझीदार बनाना सीख जाता है। वह जिस समूह का सदस्य होता है, उसके द्वारा स्वीकृत प्रतिमान के अनुसार अपने को बनाने की चेष्टा करता है।
पाँच व छः वर्ष शिशु में नैतिक भावना का विकास आरम्भ हो जाता है।

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास (SOCIAL DEVELOPMENT DURING CHILDHOOD)


बाल्यावस्था में समाजीकरण की गति तीव्र हो जाती है। बालक प्राथमिक विद्यालय में जाना आरम्भ कर देता है, नए वातावरण तथा नए साथियों के सम्पर्क उसमें अनुकूलन, समायोजन तथा सामाजिक भावना का विकास होता है तथा यह विकास तेजी से होता है। कोई बालक यदि समाज विरोधी या व्यक्तिगत व्यवहार करता है तो समूह के सभी सदस्य उसे ऐसा करने से रोकते हैं, क्योंकि बालक प्रायः किसी-न-किसी समूह का सदस्य होकर भिन्न-भिन्न प्रकार की योजनाएँ बनाता है खेल-खेलता है, आपस में वस्तुओं का आदान-प्रदान करता है। हरलॉक तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बाल्यावस्था में सामाजिक विकास निम्नवत् होता है

1. बालक विद्यालय जाने लगता है। विद्यालयी वातावरण उसके सामाजिक विकास में सहायक होता है। यहाँ पर वह नए वातावरण से अनुकूलन करना, सामाजिक कार्यों में भाग लेना तथा नए मित्र बनाना सीखता है।

2. अपने माता-पिता तथा अन्य बड़ों की छत्रछाया से अपने को मुक्त करता है और उनके साथ कम-से-कम समय बिताना चाहता है। अब उनके साथ खेलने-कूदने में आनन्द नहीं आता। उसे अपनी आयु के बालकों के साथ खेलना अच्छा लगता है।

3. अपने समूह विशेष के प्रति बालकों की गहरी आस्था या भक्ति-भाव पाया जाता है। दूसरी पीढ़ियों के दृष्टिकोण और विचारों में अन्तर के कारण माता-पिता तथा अध्यापकों को मान्यताओं का बालक की टोली की मान्यताओं और आदर्शों से प्रायः टकराव होता रहता है। अतः बालकों के सामने समायोजन से सम्बन्धी नवीन समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं।

4. समूह के सदस्य के रूप में बालक-बालिकाओं के अंदर अनेक सामाजिक गुणों का विकास होता है। उत्तरदायित्व, सहयोग, साहस, सहनशीलता, आत्मनियंत्रण, न्यायप्रियता आदि गुण बालक में धीरे-धीरे उदय होने लगते हैं।

बालक-बालिकाओं की रुचियों में स्पष्ट अन्तर दिखाई देता है। लड़कों की दौड़ने-भागने वाले खेलकूदों, घर के बाहर घूमने, मारधाड़ करने जैसे कार्यों में अधिक रुचि पाई जाती है जबकि लड़कियाँ नाच-गाना, कढ़ाई-बुनाई, घरेलू कार्यों में अधिक रुचि लेती हैं। 

6 स्वत्वाधिकार का भाव बालकों में कम पाया जाता है। सार्वजनिक सम्मान की भावना अधिक पाई जाती है। यह सामाजिक विकास की प्रगति बताता है। बाल्यावस्था में ही नेतृत्व के गुणों का विकास आरम्भ हो जाता है।

7. को एवं क्रो के अनुसार-"छ: से दस वर्ष तक के बालक अपने वांछनीय तथा अवांछनीय व्यवहार में निरन्तर प्रगति करता रहता है। बहुधा उन्हीं कार्यों को करता है, जिनके किए जाने का कोई उचित कारण जान पड़ता है।" वह अपनी बुद्धि के बल पर समाज के अनुकूल काम करता है।

8 प्राय: ऐसे बालक जिन्हें परिवार तथा साथियों में प्रशंसा, सम्मान और मान्यता नहीं मिलती, वे उद्दण्ड बन जाते हैं। इस प्रकार के बालकों का व्यवहार सबके लिए चिन्ताजनक होता है। ये बालक समस्या बालक (Problem Child) बन जाते हैं।

9. इस अवस्था में वे कई प्रकार के खेल खेलते हैं। इन खेलों के द्वारा वह सामाजिक सम्पर्क स्थापित करता है। और इस प्रकार उसमें सामाजिकता का विकास होता है। इस समय उसमें संगठित रूप से खेल खेलने की प्रवृत्ति अधिक होती है। इस प्रकार सहयोग से खेलना तथा सामाजिक नियमों का पालन करना सीख जाता है। खेल उसके सामाजिक जीवन का एक अंग बन जाता है।

किशोरावस्था में सामाजिक विकास (SOCIAL DEVELOPMENT DURING ADOLESCENCE)

किशोरावस्था में बालकों में क्रान्तिकारी शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन होते हैं जो उसके सामाजिक विकास को भी प्रभावित करते हैं। अतः इस काल में बालक के सामाजिक जीवन का क्षेत्र पहले से भिन्न तथा विस्तृत हो जाता है। अब वह अपने तथा अन्य व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों एवं परिस्थितियों के साथ समायोजन का प्रयास करता है। इस अवस्था में होने वाले सामाजिक विकास की मुख्य विशेषताओं को निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है

1. लिंग सम्बन्धी चेतना (Sex Conciousness)-किशोरावस्था में लिंग सम्बन्धी चेतना तीव्र हो जाती है। फलस्वरूप लड़के और लड़कियाँ एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का अनुभव करते हैं। तरह-तरह की वेशभूषा, केश विन्यास, हाव-भाव द्वारा वे विपरीत लिंग के सदस्यों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते दिखलाई पड़ते हैं। उनके मन में एक दूसरे के निकट आने, मित्र बनाने यहाँ तक कि यौन सम्बन्ध स्थापित करने की लालसा उत्पन्न होने लगती है। इस अवस्था में इस प्रकार सामाजिक व्यवहार की कुंजी प्रायः यौन सम्बन्धी आवश्यकताओं और अभिलाषाओं के हाथ में चली जाती है।

2. वय- समूह (Peer Group)-किशोर, किशोरियाँ अपने वय-समूह के सक्रिय सदस्य होते हैं। उनमें समूह के प्रति असीम भक्ति और आस्था पाई जाती है। वे अपने समूह के विचार, व्यवहार के ढंग, आदतें और दृष्टिकोण अपनाने का प्रयत्न करते हैं। वे अपने दल या समूह के लिए हर प्रकार का | त्याग करने के लिए तैयार रहते हैं। समूह के प्रति श्रद्धा के कारण प्रायः वे अपने माता-पिता और अध्यापकों से संघर्ष करते पाए जाते हैं।

3. सामाजिक रुचि (Social Interests) - इस अवस्था में लड़के-लड़कियाँ सामाजिक समारोहों, पार्टियों तथा आयोजनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। विविध सामाजिक समस्याओं पर वार्ता करना उन्हें रुचिकर लगता है। विभिन्न सामाजिक समस्याओं के बारे में चर्चा करते हैं।

4. सामाजिक जागरूकता (Social Awareness)- किशोरों में सामाजिक जागरूकता का विकास बड़ी तीव्र गति से होता है। किशोर अपने माता-पिता तथा अन्यों से प्रशंसा पाना चाहते हैं। उनकी आवश्यकताएँ पूरी न होने पर या उनकी रुचियों के प्रकाशन में अवरोध उत्पन्न होने पर बहुत जल्दी चिड़चिड़ा जाते हैं और स्वार्थी व्यवहार प्रदर्शित करने लगते हैं।

5. नेतृत्व (Leadership) – किशोरावस्था में नेतृत्व करने तथा प्रभावी नेतृत्व को स्वीकार करने की प्रवृत्ति पैदा होती है। प्राय: किशोर समूह में कोई न कोई नेता की भूमिका में आ जाता है। इससे उनके अन्दर सहयोग, सहानुभूति, स्पर्धा की भावना विकसित होती है।

6. विद्रोह की भावना (Feeling of Revolt)-किशोरावस्था में अक्सर लड़के-लड़कियाँ अपने माता-पिता या अन्य परिवारजनों के विचारों/मतों से विद्रोह करते हैं। इस अवस्था में माता-पिता या संरक्षक के द्वारा बनाए गए अनुशासन के नियम से उन्हें अपनी स्वतन्त्रता का हनन महसूस होता है। वे डाँट-फटकार व नियन्त्रण के विपरीत उद्दण्ड व आक्रामक बन जाते हैं।

7. राजनैतिक दलों का प्रभाव (Influence of Political Parties) - इस अवस्था में किशोर-किशोरियाँ राजनीति में भी रुचि लेने लगते हैं। विभिन्न दलों की विचारधाराओं से प्रभावित होकर उस दल के आदर्शों के अनुरूप कार्य करने लगते हैं।

8. व्यवसाय चयन में रुचि (Interest in Selection of Vocation)-किशोर अपने भविष्य के बारे में योजनाएँ बनाने लगते हैं। वे किस क्षेत्र में नौकरी या व्यवसाय करेंगे, इसके बारे में साथियों या बड़ों से विचार-विमर्श करते हैं तथा मार्गदर्शन लेते हैं।

9. वीरपूजा (Ideal Worship)-किशोरावस्था में बालकों का किसी महान नेता, कलाकार, वैज्ञानिक या आदर्श अध्यापक को आदर्श मानकर उसके अनुसार चलने की प्रवृत्ति आ जाती है। कभी-कभी वह सिनेमा के नायक या अभिनेता को भी आदर्श रूप में मानने लगता है। अतः इस अवस्था मैं वीर पूजा की भावना का विकास होता है । इसके द्वारा उसमें समाज तथा राष्ट्र के प्रति त्याग की भावना का विकास होता है।

किशोरावस्था अत्यधिक सामाजिक चेतना, बढ़ते हुए सामाजिक सम्बन्धों और प्रगाढ़ मित्रता की अवस्था होती है। इस अवस्था में व्यक्ति को सामाजिक समायोजन तथा सामाजिक गुणों का अर्जन करने के लिए पर्याप्त अवसर तथा रुचियों एवं अभिरुचियों का विशाल क्षेत्र मिलता है। इस अवस्था के दौरान व्यक्ति अपने आपको अपने सामाजिक जीवन में एक उत्तरदायित्वपूर्ण प्रौढ़ व्यक्ति की भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार करता है। इस अवस्था के अन्त तक प्रायः बालक सामाजिक रूप से परिपक्व (Socially Mature) हो जाता है।


सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS INFLUENCING SOCIAL DEVELOPMENT)

शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने अनेक ऐसे कारकों का वर्णन किया है जो बालक के सामाजिक विकास को प्रभावित करते हैं। इनमें से निम्नांकित अधिक मुख्य हैं

1. आनुवांशिकता (Heredity)-मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के आधार पर यह प्रस्थापित किया है कि बालक के सामाजिक विकास पर भी आनुवांशिकता का थोड़ा-बहुत प्रभाव पड़ता है। भारत में कई ऐसे महान् लोगों के उदाहरण मिल जाते हैं जिनके पूर्वज उच्च सामाजिक मूल्य धारण करते थे और उनमें भी सामाजिक मूल्यों की प्रधानता थी वंश परम्परा के रूप में उन्हें अपने पूर्वजों से ये मूल्य प्राप्त हुए। उदाहरणार्थ, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर व पं जवाहर लाल नेहरू का नाम प्रस्तुत किया जा सकता है।

2. परिवार ( Family)-परिवार के सदस्यों के बीच दुलार प्यार, सहयोग आदि की भावना धिक होती है। इन सबका प्रभाव बालक के समाजीकरण पर पड़ता है। अनेक मनोवैज्ञानिकों का मत है कि परिवार ही वह पहली संस्था है जो बालक को शिष्टाचार एवं नैतिक विकास की शिक्षा देकर उन्हें योग्य व्यक्ति बनाता है। कुछ माता-पिता अपने बच्चों को प्यार दुलार, स्नेह आदि देते हैं, परन्तु कुछ माता-पिता इसके विपरीत होते हैं और बात बात में बच्चों को डाँटते हैं, पीटते हैं और गाली देते हैं। मनोवैज्ञानिकों ने इस बात पर सहमति जताई है कि जिन माता-पिता द्वारा बालकों के प्रति हार्दिकता (Wormth) दिखाई जाती है, उनके बच्चों में सामाजिक शील-गुणों एवं सामाजिक व्यवहारों का विकास तेजी से होता है माता-पिता से विद्वेष (hostility) पाने वाले बालकों में ऐसे गुणों का विकास नहीं होता। माता-पिता से उचित प्यार-दुलार व स्नेह मिलने से बालकों में सुरक्षा की भावना, आत्मसम्मान, आत्मविश्वास आदि गुण उत्पन्न होते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच अंतः क्रिया के अलावा परिवार के अन्य पहलू (परिवार का आकार, परिवार में सदस्यों की संख्या, भौतिक वातावरण आदि) का भी बालक के समाजीकरण पर प्रभाव पड़ता है।

3. साथियों का समूह (Peer Group)- बालकों द्वारा निर्मित टोली की विशेषता यह होती है। कि उसमें सभी बालक करीब-करीब एक ही उम्र के होते हैं। टोली बालकों को लोकतांत्रिक होना सिखाती है, स्वार्थ तथा समाज विरोधी विचारों से ऊपर उठकर साथियों के साथ मिलकर कार्य करना सिखाती है तथा साथ ही साथ उनमें प्रतियोगिता की भावना उत्पन्न करके अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को बढ़ाने का अवसर देती है।

साथियों का समूह भिन्न-भिन्न परिवारों के बालकों को एक-दूसरे के नजदीक आने का मौका देती है तथा उन्हें एक सामाजिक रूप से अनुमोदित व्यवहार करने की प्रेरणा देता है। साथियों के समूह में बालक सामाजिक मूल्यों को समझने और उनके अनुसार व्यवहार करना सीखते हैं। साथियों द्वारा प्राप्त अनुभवों से बालकों में उचित सामाजिक मनोवृत्ति विकसित होती है। साथियों का समूह सदस्यों को सांवेगिक सन्तुष्टि देता है।

4. विद्यालय ( School) -विद्यालय सिर्फ बालकों को शिक्षा ही नहीं देता है बल्कि सामाजिक मूल्यों, सामाजिक संज्ञान (Social Cognitions) सामाजिक मानकों (Social Norms) के बारे में बताकर बालकों में समाजीकरण के बीज बोता है।

5. अध्यापक ( Teacher)-अध्यापक का व्यक्तित्व तथा उनके द्वारा विद्यार्थियों के साथ होने वाली अन्तःक्रियाओं का बालक के समाजीकरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः देखा गया है कि अध्यापक स्वयं सामाजिक शील-गुणों से पूर्ण है तथा बालकों के साथ स्नेहमयी अन्तःक्रियायें करते हैं, तो इससे बालकों में प्रोत्साहन होता है, बालकों में सांवेगिक और सामाजिक समायोजन की क्षमता बढ़ जाती है। ऐसे बालकों का समायोजन तेजी से होता है। बालक अध्यापक के व्यवहारों का अनुकरण करते है। अतः यदि अध्यापक स्वयं ही कुसमायोजित (Matadjusted) होगा तो बालकों में कुसमायोजन की समस्या आ जाती है और उनके समाजीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। हिल तथा एटोन (1977) ने एक अध्ययन में पाया कि जो अध्यापक बालकों के साथ पुरस्कारी अन्तःक्रिया (Rewarding Interaction) अधिक करते हैं, उनके व्यवहारों का अनुकरण बालक अधिक करते हैं।

6. संवेगात्मक विकास (Emotional Development) - बालक का संवेगात्मक विकास भी उसके सामाजिक विकास को प्रभावित करता है। स्नेह और विनोद के भाव रखने वाला बालक सभी का स्नेह पात्र होता है, जबकि इसके विपरीत सदैव ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष व घृणा के भाव रखने वाले बालक की उपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों के सामाजिक विकास में अन्तर होना स्वाभाविक है। क्रो व क्रो के अनुसार- "संवेगात्मक और सामाजिक विकास साथ-साथ चलते हैं।"

7. शारीरिक तथा मानसिक विकास (Physical and Mental Development) – जिन बालकों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होता है उनका सामाजिक विकास भी वांछित दिशा में वांछित गति से होता है। शारीरिक रूप से विशिष्ट, मोटे, बहुत पतले, नाटे आदि बालकों को अपने समूह में उपेक्षा झेलनी पड़ती है या समाज उन्हें हँसी का पात्र बना लेता है तो उनके अन्दर हीन भावना जन्म ले लेती है, वे समाज से समायोजन स्थापित नहीं कर पाते। जो बालक मानसिक स्वास्थ्य में दुर्बल होते हैं, चिन्ता व द्वन्द्व में रहते हैं, भग्नाशा के शिकार होते है, उनका समाजीकरण उचित रूप से नहीं हो पाता। ऐसे बालक समस्यात्मक बालक बन जाते हैं।

8. पास-पड़ोस (Neighbourhood)- बालकों के समाजीकरण में पास-पड़ोस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पास-पड़ोस के व्यक्तियों के सम्पर्क में आने से बालक नए-नए व्यवहार सीखता है। आपस में मिलकर भिन्न-भिन्न तरह की सामाजिक समस्याओं पर बात करता है जिससे वह नए-नए आदर्शों से परिचित होता है और उसे चेतन या अचेतन रूप से अपने व्यक्तित्व में समावेशित कर लेता है। इससे उसके समाजीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। उसमें सहकारिता, परोपकारिता जैसे सामाजिक गुणों का विकास होता है।

9. आर्थिक स्थिति (Economic Condition) - बालक के सामाजिक विकास पर घर की स्थिति का प्रभाव पड़ता है। धनी परिवार के बालक अच्छे निवास स्थान तथा वातावरण में रहते हैं। उन्हें सभी प्रकार के सुख साधन उपलब्ध होते हैं। वे अच्छे विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करते हैं। जबकि निर्धन परिवार के बालक आवश्यक सुविधाओं से रहते हैं, इससे उनका सामाजिक विकास भी प्रभावित होता है।

10. धार्मिक संस्थाएँ और क्लब आदि (Religious Institutions and Clubs)- विभिन्न धार्मिक संस्थाएँ (मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा इत्यादि) बालकों के सामाजिक विकास को प्रभावित करते हैं। समाज के सदस्यों के इकट्ठे होकर विचार-विनिमय करने, एक-दूसरे सम्पर्क में आने तथा पारस्परिक सम्बन्ध को बढ़ाने के दृष्टिकोण से इन संस्थाओं का बहुत महत्व है। इन धार्मिक और सामाजिक स्थानों में जिस तरह का वातावरण होता है और इन संस्थाओं के जो आदर्श, परम्पराएँ और मान्यताएँ होती हैं उनका बालकों के सामाजिक व्यवहार को उचित और अनुचित दिशा प्रदान करने में बहुत बड़ी भूमिका होती है।

11. सूचना एवं मनोरंजन के साधन (Means of Information and Entertainment)- समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं, रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन आदि सूचना और मनोरंजन प्रदान करने वाले साधनों की बालक के सामाजिक विकास में बहुत बड़ी भूमिका होती है। ये साधन बालकों को सामाजिक संरचना, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं से अवगत कराते रहते हैं। ये उनमें सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, बुराइयों, कुसंस्कारों के प्रति घृणा पैदा करके उनके उन्मूलन की दिशा में बालकों को अग्रसर करने में सक्षम होते हैं। परन्तु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इनके द्वारा बालकों के ऊपर कोई अवांछनीय प्रभाव न पड़े।

अध्यापकों के लिए सामाजिक विकास के निहितार्थ (IMPLICATIONS OF SOCIAL DEVELOPMENT FOR TEACHERS)

बालकों की शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अध्यापक की होती है। अध्यापकों द्वारा प्रयुक्त शिक्षण संव्यूहन (teaching strategies), विद्यार्थियों के साथ व्यवहार तथा अन्तःक्रिया, बालकों के सामाजिक विकास पर प्रभाव डालता है। अध्यापक का कर्त्तव्य होता है कि वह बालक को समाज और परिस्थितियों के अनुरूप बनाए। बालकों में सामाजिक अनुकूलन की क्षमता पैदा करने में अध्यापक तभी प्रभावी हो सकता है जब उसे बालकों के सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों और तत्वों का ज्ञान हो। अध्यापक अपने शिक्षण और व्यवहार के द्वारा बालक को समाज के मूल्यों, मानदण्डों, नियम, कानूनों, आदर्शों आदि का अवबोध करा सकता है। अतः अध्यापकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बालकों की उचित-अनुचित में भेद करने तथा समाज-सम्मत व्यवहार करने का प्रशिक्षण दे। बालक के सामाजिक विकास का ज्ञान रखने वाला अध्यापक बड़ी कुशलता से बालक को समाज की आदर्शात्मक व्यवस्था से परिचित करा सकता है।

अध्यापकों के लिए बालकों के सामाजिक विकास के निहितार्थों को निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है:- 

1. अध्यापक और विद्यार्थियों के मध्य घनिष्ठता पैदा होनी चाहिए, जिससे कि अध्यापक का विद्यार्थी पर नैतिक दबाव और नियन्त्रण बना रह सके। 

2. अध्यापकों को चाहिए कि विभिन्न पाठ्य सहगामी क्रिया-कलापों का आयोजन करें और विद्यार्थियों को प्रतिभागिता के लिए प्रोत्साहित करें। इससे उन्हें सामूहिक जीवन के अनुभव प्राप्त होंगे। 

3. अध्यापक को चाहिए कि वह कक्षा के अन्दर तथा कक्षा के बाहर विद्यार्थियों को विविध प्रकार के क्रियाकलापों में व्यस्त करना चाहिए। ये क्रियाकलाप केवल व्यक्तिगत ही न हों, सामूहिक भी हों। इन क्रियाकलापों के आयोजन में अध्यापक को जनतान्त्रिक मूल्यों को आधार बनाकर विद्यार्थियों में स्पष्ट विचार, अनुशासन, सहनशीलता, सहयोग, देश प्रेम आदि गुणों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। 

4. अध्यापकों का कर्तव्य है कि बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए। अध्यापक को विद्यार्थियों के माता-पिता से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए ताकि वह विद्यार्थियों की रुचियों, मनोवृत्तियों आदि को समझ सके और बालक का समाजीकरण उचित दिशा में कर सके। 

5. कक्षा, खेल के मैदान में, साहित्यिक व सांस्कृतिक क्रियाओं में अध्यापक सामाजिक व्यवहार के आदर्श प्रस्तुत करता है। बालक अपनी अनुकरण की मूल प्रवृत्ति के कारण अध्यापक के कार्य/व्यवहार के तरीकों और ढंगों का अनुकरण करता है। अतः अध्यापक को सदैव सतर्क रहना चाहिए कि उसके गलत आचरण से विद्यार्थी प्रभावित न हो।

6. अध्यापक को स्नेह, पक्षपात रहित तरीके से विद्यार्थियों को उनके असामाजिक व्यवहार के लिए आगाह करना चाहिए। यदि असामाजिक व्यवहार करने वाले बालकों को अन्य बालकों के साथ मिलने-जुलने से रोक दिया जाएगा तो उनमें सुधार आने की सम्भावना कम रहेगी, उसका सामाजिक विकास गलत दिशा में होने की सम्भावना अधिक हो जाएगी।

7. अध्यापकों को बालकों में सामाजिक उत्तरदायित्व (Social responsibility) उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों से अवगत होना चाहिए ताकि वे विद्यार्थियों को उत्तरदायित्वपूर्ण गृहकार्य देकर सामाजिक शीलगुणों के विकास के अवसर प्रदान कर सकें। 

8. विद्यार्थियों में सामाजिक सूझ (Social insight) का विकास करना भी अध्यापकों का दायित्व है। अध्यापकों को चाहिए कि विविध व खास-खास सन्दर्भों को पढ़ाते समय विभिन्न प्रकार के सामाजिक व्यवहारों को सीखने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करें। विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याओं से विद्यार्थियों को अवगत कराएँ।

9. सहकारी अधिगम (Cooperative learning) से सम्बद्ध अनुदेशन विधियाँ सामाजिक दक्षता (Social competency) विकास में सहायक होती हैं। अध्यापकों को चाहिए कि अवसर के अनुसार किसी विषय या प्रश्न पर विद्यार्थियों से उनके विचार लिखवाएँ, फिर उन्हें 2 या 4 के समूह बनाकर अपने विचारों का आदान-प्रदान करने को प्रेरित करें।

10. विद्यार्थियों में शैक्षिक दक्षता (Academic competency) के साथ-साथ ही सामाजिक दक्षता का विकास करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

11. सहकारी समूहों में विद्यार्थी संफलतापूर्वक कार्य करें, इसके लिए यदि आवश्यकता हो तो अध्यापक विद्यार्थियों को सामाजिक कौशल के लिए सीधे निर्देश दे सकता है, जैसे-दूसरों की बात सुनने, समूह विचार-विमर्श में भाग लेने, साथियों के साथ सम्मानपूर्वक अन्तः क्रिया व तर्क-वितर्क करने, बड़ों से व्यवहार करने आदि से सम्बन्धित निर्देश।

12. प्राथमिक कक्षाओं के अध्यापकों को अपनी पाठ योजना इस प्रकार तैयार करनी चाहिए जिससे कि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों का प्रकाशन हो सके; जैसे-संवेगों का अभिव्यक्तिकरण, सामाजिक जागरूकता, निर्णय क्षमता का उन्नयन, क्रोध और तनाव पर नियन्त्रण आदि।

13. अध्यापक को कक्षा-कक्ष का प्रबन्धन इस तरह करना चाहिए कि बालक को कोर्स सीखने के साथ-साथ सामाजिक कौशल के विकास का भी अवसर प्राप्त हो सके।

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