Recents in Beach

किशोरावस्था की विशेषतायें CHARACTERISTICS OF ADOLESCENCE

किशोरावस्था की विशेषतायें (CHARACTERISTICS OF ADOLESCENCE)


किशोरावस्था जीवन के विकास क्रम की एक महत्वपूर्ण अवस्था है। इसके महत्व व विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए स्टेनले हॉल ने लिखा है-"किशोरावस्था एक नया जन्म है, क्योंकि इसी में उच्चतर और श्रेष्ठतर मानव विशेषताओं के दर्शन होते हैं।" 

किशोरावस्था की विशेषताओं के सम्बन्ध में बिग व हण्ट ने कहा है" किशोरावस्था की विशेषताओं को सर्वोत्तम रूप से प्रकट करने वाला एक शब्द है-परिवर्तन। यह परिवर्तन शारीरिक, सामाजिक व मनोवैज्ञानिक होता है।"


उपर्युक्त परिभाषायें किशोरावस्था की कुछ प्रमुख विशेषताओं की ओर इंगित करती हैं। जो इस प्रकार हैं


1. परिवर्तनों की अवस्था (Period of Change)-किशोरावस्था अनेक प्रकार के परिवर्तनों की अवस्था है। इस अवस्था में इतने अधिक परिवर्तन होते हैं कि बालक धीरे-धीरे परिपक्वता प्राप्त कर लेता है। केवल शारीरिक ही नहीं मानसिक, संवेगात्मक एवं सामाजिक परिवर्तन तीव्र गति से होते हैं जिससे बाल्यावस्था की आदतें, व्यवहार व लक्षण समाप्त होते जाते हैं और व्यवहार, रुचियाँ व आदतों का एक परिपक्व प्रौढ़ स्वरूप प्रकट होने लगता है।

हरलॉक के अनुसार-"किशोर को धीरे-धीरे किशोरावस्था के परिवर्तनों का ज्ञान हो जाता है और इस ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ वह वयस्क व्यक्तियों की भाँति इसलिये व्यवहार करना प्रारम्भ कर देता है क्योंकि वह वयस्क दिखायी देने लगता है।"

किशोरावस्था के परिवर्तनों में शारीरिक परिवर्तन प्रमुख हैं। इन शारीरिक परिवर्तनों से यौनिक परिपक्वता आती है फलस्वरूप बालकों की आवाज भारी हो जाती है। दाढ़ी, मूछें निकल आती हैं। बालिकाओं में वक्षस्थल का विकास होता है, मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है। बालक और बालिकाओं में कामेच्छा जाग्रत हो जाती है। शारीरिक विकास के अतिरिक्त ज्ञानेन्द्रियों का पूर्ण विकास हो जाता है। मस्तिष्क व हृदय अनुपात में आ जाते हैं तथा लम्बाई की भी पूर्ण वृद्धि हो जाती है। किशोरावस्था में परिवर्तनों को इस अवस्था में समायोजन सम्बन्धी समस्या उत्पन्न हो जाती है। यदि परिवर्तन सामान्य गति से होते हैं तो बालकों के लिये समायोजन करना आसान होता है। किन्तु यदि परिवर्तन तीव्र या मंद होते हैं तो विकास के विभिन्न क्षेत्रों में समायोजन सम्बन्धी समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं।


2. संक्रान्ति काल (Period of Transition) किशोरावस्था बाल्यावस्था को प्रौढ़ावस्था से जोड़ने वाली अवस्था है अतः इस स्थिति में किशोर असमंजस की स्थिति में रहता है न तो उसे पूरी तरह बालक समझा जाता है, न ही पूरी तरह प्रौढ़। ऐसी स्थिति में जब वह बालकों जैसा व्यवहार करता है तो उससे परिपक्व व्यवहार की आशा की जाती है और जब वह वयस्कों की तरह व्यवहार करने का प्रयास करता है तो उससे कहा जाता है कि वह अपनी सीमाओं में रहकर कार्य करे। उसे स्वयं अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं होती है जिससे उसे परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार करने में कठिनाई होती है। इसीलिये इस अवस्था में उच्च संवेगात्मकता के लक्षण किशोरों में दिखायी देते हैं।

डॉ. पी. आसुबेल का मानना है कि व्यक्ति किशोरावस्था में शारीरिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत बदल जाता है। वह अब निरा बालक नहीं रहता है, बल्कि बड़ा हो जाता है। इसके कारण कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्वों, विशेषाधिकारों और दूसरों के साथ सम्बन्ध में विशेष परिवर्तन होता है उसमें अपने-आप, माता-पिता, टोली, नेता और अन्य के प्रति अभिवृत्तियों में परिवर्तन पाया जाता है।


3. निश्चित विकास प्रतिमान (Definite Pattern of Development)-किशोरावस्था में विकास का एक निश्चित स्वरूप होता है इसीलिये विभिन्न विशेषतायें निश्चित आयु-स्तर पर सामान्य विकास क्रम में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती हैं। जैसे शारीरिक विकास चरम सीमा पर होता है, यौन परिपक्वता आ जाती है, उच्च संवेगात्मकता के लक्षण दिखायी देते हैं। रुचियों व अभिवृत्तियों में परिवर्तन आ जाता है। किशोर समूह में अपेक्षित व्यवहारों को करने लगता है। असुरक्षा की भावना से घिरा रहता है। काम शक्ति तीव्र हो जाती है। शारीरिक परिवर्तनों में वृद्धि अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है। स्थिरता व समायोजन का अभाव होता है, स्वतंत्रता व विद्रोह की भावना प्रबल रहती है।


4. शैशवावस्था की पुनरावृत्ति (Recapitulation of Inkancy)-रॉस (Ross) ने किशोरावस्था को शैशवावस्था का पुनरावर्तन कहा है। किशोरों के अनेक लक्षण ऐसे होते हैं जो शिशुओं की भाँति दिखायी देते हैं, जैसे-किशोरों में संवेगात्मक अस्थिरता अधिक होती है, उन्हें भी शिशुओं की भाँति वातावरण के साथ समायोजन करना पड़ता है। किशोर भी शिशुओं के समान आकर्षण का केन्द्र बनना चाहता है। शैशवावस्था में कामुकता माँ के प्रति होती है जबकि किशोरावस्था में यह विपरीत लिंग के प्रति दिखायी देती है अत: कहा जा सकता है कि किशोरावस्था शैशवावस्था की पुनरावृत्ति है।


5. आदर्शवाद और वीर पूजा की अवस्था (Idealism or Age of Heroworship)- जीवन मूल्यों से प्रेरित होकर किशोर अपने जीवन के कुछ आदर्श निर्धारित करते हैं। ये आदर्श उसे स्वयं के प्रति, समाज के प्रति परिवार के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करने की दिशा प्रदान करते हैं। जब किशोर अपने आदर्शों के अनुसार अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं कर पाता है तो उसमें असंतोष और विद्रोह की भावना उत्पन्न होती है।

वीर पूजा की भावना का विकास भी इसी अवस्था में होता है। किशोरावस्था विकसित सामाजिकता की अवस्था होने के कारण किशोर बालक समाज के अनेक व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। इनमें से कुछ व्यक्तियों के व्यक्तित्व से वह प्रभावित हो जाता है और उन्हें अपना आदर्श मानकर अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है। किशोर के ये आदर्श उसके माता-पिता, शिक्षक, मित्र नेता तथा नाटकीय पात्र हो सकते हैं।


6. समूह को महत्व (Importance to Group)-किशोरावस्था में बालकों का सामाजिक क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत होता है तथा मित्रों की संख्या अधिक होती है। वह परिवार से अधिक मित्रों व समूह के बीच रहना पसन्द करता है। किशोर जिस समूह का सदस्य होता है उसे वह सर्वोपरि समझता है। समूह ही उनका आदर्श होता है। यदि माता-पिता व शिक्षक के आदर्श समूह से पृथक् होते हैं तब भी वह समूह के आदर्शों को ही श्रेष्ठतर समझ कर उनका अनुपालन करता है तथा अपनी रुचियों, इच्छाओं, व्यवहारों और क्रियाओं में समूह के अनुसार परिवर्तन लाता है।

बिग एवं हण्ट (Bigge and Hunt) के अनुसार-"जिन समूहों से किशोर का सम्बन्ध होता है उनसे उसके लगभग सभी कार्य प्रभावित होते हैं। समूह उसकी भाषा, नैतिक मूल्यों, वस्त्र पहनने की आदतों और भोजन करने के तरीकों को प्रभावित करता है।"


7. विकसित सामाजिकता की अवस्था (Period of Developed Social Relationship) - किशोरावस्था की एक प्रमुख विशेषता विकसित सामाजिक भावना होती है। किशोरों का सामाजिक क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत होता है। मित्रों की संख्या जीवन के इस काल में सबसे अधिक होती है। घनिष्ठ मित्रता भी इसी आयु में विकसित होती है। उनकी मित्रता में जाति, धर्म, रंग, रूप और आर्थिक व सामाजिक स्थिति कोई मायने नहीं रखती है। वे अपने मित्रों के साथ परस्पर सहयोग और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते हैं।

इस अवस्था में मित्रता कई स्तरों पर होती है। कुछ मित्र इसलिये बनाये जाते हैं क्योंकि उन्हें किशोर विश्वासपात्र समझता है। कुछ को विशिष्ट कार्यों हेतु उपयोगी समझने के कारण मित्र बनाता है। जबकि कुछ से साधारण परिचय ही रखता है। कहने का आशय यह है कि मित्रता का दायरा अधिक होता है। जैसे-जैसे सामाजिकता का दायरा बढ़ता जाता है वैसे-वैसे वह परिवार के दायित्वों के प्रति उदासीन होता जाता है।

समलिंगी ही नहीं विषमलिंगी भी किशोरों के मित्र होते हैं किन्तु किशोर विषमलिंगी साथियों के साथ सभ्य आचरण का प्रदर्शन करके अपनी नैतिकता और परिपक्व सामाजिकता का परिचय देता है। समूह में रहने के कारण आत्मप्रदर्शन तथा नेतृत्व की भावनायें अपनी चरम सीमा पर होती हैं तथा। समाज के रीतिरिवाजों, प्रथाओं और परम्पराओं के प्रति निष्ठा का भाव भी इसी अवस्था में विकसित होता है। सामाजिक जीवन में आत्म नियंत्रण उत्पन्न करने के लिये वह अपने अंदर नवीन मनोवृत्तियों, रुचियों, विचारों और मूल्यों का निर्माण करता है। सामाजिक कार्यक्रमों में रुचि प्रदर्शित करता है सामाजिक आयोजनों में सक्रिय रूप से भाग लेता है और समूह के साथ विभिन्न प्रकार की पारिवारिक, व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक चर्चाओं में भाग लेता है। किशोरों में निस्वार्थ सेवा की भावना भी प्रबल होती है। विभिन्न प्रकार की आपदाओं; जैसे-बाढ़, भूकम्प, महामारी आदि के समय उसकी समाज सेवा देखी जा सकती है।

रॉस (Ross) के ये शब्द किशोरों की समाज सेवा की भावना को प्रकट करते हैं- “किशोर समाज सेवा के आदर्शों का निर्माण व पोषण करता है। उसका उदार हृदय मानव जाति के प्रेम से ओतप्रोत होता है तथा वह आदर्श समाज का निर्माण करने में अपनी सहायता देने के लिये उद्विग्न रहता है।" अतः स्पष्ट है कि किशोरों में अहं के स्थान पर हम की भावना तीव्र हो जाती है और वह सुन्दर समाज के लिये अपनी निःस्वार्थ सेवा देने के लिये तत्पर रहता है।


8. रुचियों में परिवर्तन व स्थिरता (Changes in Interest and Stability)-पूर्व किशोरावस्था तक बालकों की रुचियों में परिवर्तन होता रहता है किन्तु किशोरावस्था पूर्ण होने तक किशोरों की रुचियों में स्थिरता आ जाती है। किशोरावस्था में सामाजिकता का क्षेत्र व्यापक होता है अतः किशोरों में विभिन्न प्रकार की रुचियों का विकास होता है। शारीरिक रूप से वह अपने अंगों को सुडौल व आकर्षक बनाने तथा सजाने में रुचि रखता है। मानसिक दृष्टि से वह पढ़ने में रुचि रखता है। फलस्वरूप समाचार पत्र, पत्रिकायें, उपन्यास, नाटक तथा आलोचनाओं को पढ़ने में रुचि बढ़ जाती है। मनोरंजन के लिये चलचित्र, सैरसपाटा, पिकनिक, खेलकूद आदि में रुचि रखता है। सामाजिक दृष्टि से उसकी रुचि, समाज सेवा, सामाजिक सहभागिता, पार्टियों में जाना, समूह बनाना, विपरीत लिंग से मित्रता करना, दूसरों के दुःख-सुख में भाग लेना, निःस्वार्थ सेवा करना आदि में बढ़ के जाती है।

किशोरावस्था में रुचियों का जो स्वरूप निर्धारित हो जाता है वही जीवन पर्यन्त तक बना रहता है। वेलेन्टाइन (Valentine) के अनुसार-"किशोर बालक और बालिकाओं की रुचियों में समानता भी होती है और भिन्नता भी उदाहरणार्थ-बालक और बालिकाओं में निम्नांकित रुचियाँ होती है- पत्र पत्रिकायें, नाटक, कहानियाँ और उपन्यास पढ़ना, सिनेमा देखना, रेडियो सुनना, शरीर को अलंकृत करना, विषमलिंगी से प्रेम करना आदि। बालकों को खेलकूद और व्यायाम में विशेष रुचि होती है इसके विपरीत बालिकाओं में कढ़ाई-बुनाई, नृत्य और संगीत के प्रति विशेष आकर्षण होता है।"


9. स्वतंत्रता व विद्रोह की भावना (Freedom and Revolt Feeling) शारीरिक व मानसिक विकास व परिपक्वता के कारण किशोरावस्था में बालक व बालिकाओं में शारीरिक व मानसिक स्वतंत्रता की भावना प्रबल हो जाती है। वह माता-पिता व समाज के ऐसे नियमों, प्रथाओं, रीतरिवाजों और आदर्शों का विरोध करता है जो उन्हें ठीक नहीं लगते। वह परम्पराओं के बंधन में नहीं बंधना चाहता है बल्कि स्वतन्त्र रूप से सोचना और कार्य करना चाहता है। यदि उस पर किसी प्रकार का बंधन लगाया जाता है तो वह विद्रोह करता है।

कोलेसनिक (Kolesnik) के अनुसार, "किशोर प्रौढ़ को अपने मार्ग में बाधा समझता है, जो उसे अपनी स्वतन्त्रता का लक्ष्य प्राप्त करने से रोकते हैं।" बी. एन. झा (B. N. Jha) ने भी कुछ इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये हैं, उनके अनुसार "किशोर अपने आपको बन्धन से स्वतन्त्र करना चाहता है।"


10. आत्मनिर्भरता की अवस्था (Period of Self Dependence) - किशोर बालक शारीरिक और मानसिक रूप से इतना परिपक्व हो जाता है कि उसमें यह भावना विकसित हो जाती है कि वह अपना कार्य स्वयं कर सकता है और दूसरों के कार्यों में भी सहयोग प्रदान कर सकता है। इससे उनमें अहं और आत्म निर्भरता की भावना का विकास होता है। यही भावना किशोरों के प्रौढ़ जीवन का आधार बनती है। 


11. व्यवसाय चुनने की अवस्था (Period of Selecting Occupation) - किशोर बालक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहता है। वह अपनी शारीरिक व मानसिक क्षमता और शैक्षिक योजनानुसार उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव कर आत्मनिर्भर बनना चाहता है। उपयुक्त व्यवसाय न मिल पाने पर युवा तनावग्रस्त हो जाता है और सही मार्गदर्शन के अभाव में ऐसे युवा अपराधों की और प्रवृत्त हो जाते हैं। बेरोज़गारी के कारण वर्तमान समय में युवा तनाव व अपराधों की संख्या में वृद्धि हो रही है। 


12. अपराध प्रवृत्ति का विकास (Development of Delinquency)- वैलेन्टाइन के अनुसार- "किशोरावस्था अपराध प्रवृत्ति के विकास का नाजुक समय है। पक्के अपराधियों की एक विशाल संख्या किशोरावस्था में ही अपने व्यावसायिक जीवन को गम्भीरतापूर्वक आरंभ करती है।" किशोरों में संवेगात्मक अस्थिरता पायी जाती है। निराशा, असफलता प्रेम का अभाव, बेरोजगारी, माता पिता का नियंत्रण, महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति न हो पाना आदि ऐसे कारण हैं जिनसे किशोर विचलित हो जाता है और अपराधों की और प्रेरित होता है।


13. स्थिति व महत्व की अभिलाषा (Will of Status and Importance)- किशोर चूंकि स्वयं को आत्मनिर्भर समझते हैं इसलिये वे प्रौदों के समान अपनी एक निश्चित पहचान बनाना चाहते है जिससे वे श्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में स्वीकार किये जायें। वे अपना एक पृथक् अस्तित्व चाहते हैं। ब्लेयर, जोन्स एवं सिम्पसन (Blair, Jone and Simpson) के कथनानुसार-"किशोर महत्वपूर्ण बनना, अपने समूह में स्थिति प्राप्त करना और श्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाना चाहता हैं। "


14. प्रौढ़ जीवन की तैयारी की अवस्था (Period of Preparation Adulthood) किशोरावस्था में बालक अपने व्यवसाय के बारे में चिन्तित रहता है क्योंकि इस समय बालक में आत्मनिर्भर बनने का भाव पैदा हो जाता है। आत्मनिर्भरता उसे प्रौढ़ावस्था के लिये तैयार करती है। अब वे अपने ऐसे व्यवहारों को विकसित करने लगते हैं जो उनमें गंभीरता लाते हैं। 


15. ईश्वर व धर्म में विश्वास (Belief in God & Religion) - बाल्यावस्था में बालक ईश्वर और धर्म के प्रति अधिक समर्पित नहीं होते हैं किन्तु धीरे-धीरे किशोर बालक ईश्वर की सत्ता को स्वीकारने लगते हैं और धर्म के प्रति उनका रुझान बढ़ जाता है। 


16. जीवन दर्शन का निर्माण (Construction of Life Philosophy)-प्रौढ़ावस्था की और अग्रसरित होने वाले किशोर अपने जीवन मूल्यों के आधार पर अपना जीवन दर्शन बना लेते हैं जिसके तहत वे ऐसे नियमों व सिद्धान्तों का निर्माण करते हैं जिनकी सहायता से वे अपने जीवन में सफल हो सकें।


17. यौन भावना की जागृति (Excitement of Sex Felling)- किशोरावस्था का महत्वपूर्ण विकास लैंगिक विकास और लैंगिक परिपक्वता है। इसीलिये इस काल को यौनभावना का जागृतिकाल कहा जाता है। प्रजनन अंगों में पर्याप्त वृद्धि होने से उनमें परिपक्वता व प्रजनन शक्ति आ जाती है। इस अवस्था में यौन विकास की तीन अवस्थायें होती है

(i) स्वप्रेम-किशोरावस्था के प्रारम्भिक यौन विकास में किशोर स्वप्रेमी होता है। वह स्वयं को सुन्दर देखना चाहता है। बालक और बालिका दोनों ही अपनी सुन्दरता के प्रति जागरूक रहते हैं। सुन्दर दिखने के लिये वह विभिन्न तरीके अपनाते हैं। बालिकायें डायटिंग शुरू कर देती है अपने | सौन्दर्य प्रसाधनों के प्रति सचेत हो जाती है, बालों तथा वस्त्रों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। फ्रायड ने इस स्थिति को 'Narcissim' कहा है। इसके अतिरिक्त प्रेम का दूसरा रूप है अपने यौन अंगों को स्पर्श कर आनन्दाभूति प्राप्त करना यह क्रिया अप्राकृतिक है इससे हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है। 

(ii) समलिंगीय कामुकता इस अवस्था में समलिंगीय प्रेम बढ़ जाता है। बालक-बालकों के साथ तथा बालिकायें बालिकाओं के साथ रहना, घूमना, बातचीत करना पसंद करते हैं।

(iii) विषमलिंगीय कामुकता यह उत्तर किशोरावस्था में विकसित होती है, बालक तथा बालिकार्ये विपरीत लिंग की ओर आकर्षित होते हैं। अधिक समय एक-दूसरे के साथ बिताना चाहते है। परिवार व समाज का विरोध करने पर छिप-छिपकर मिलते हैं। एक दूसरे का शारीरिक स्पर्श करने पर आनन्द की अनुभूति करते हैं तथा अतिकामुकता होने पर विवाह पूर्व ही शारीरिक सम्बन्ध बना लेते हैं।

Post a Comment

0 Comments

close