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शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के मानदण्ड CRITERIA OF FORMULATING EDUCATIONAL OBJECTIVES

शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के मानदण्ड (CRITERIA OF FORMULATING EDUCATIONAL OBJECTIVES)

किसी समाज के शिक्षा के उद्देश्य मुख्य रूप से उसके व्यक्तियों के जीवन दर्शन पर आधारित होते है। समाज की विशेष संरचना, उसकी सभ्यता एवं संस्कृति तथा धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति का भी शिक्षा के उद्देश्यों पर प्रभाव पड़ता है। मानव की स्वयं की प्रकृति भी शिक्षा के स्वरूप को प्रभावित करती है। शिक्षा युग के प्रभाव से भी अछूती नहीं रह सकती है। वर्तमान युग विज्ञान का युग है। अत इसका भी शिक्षा के उद्देश्यों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। निष्कर्ष यह है कि शिक्षा के उद्देश्यों का मनुष्य के जीवन और समाज के आदर्शों से गहरा सम्बन्ध होता है इसीलिए शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में इनका सर्वाधिक महत्त्व होना चाहिए।

डी. के. व्हीलर (D. K. Wheeler) ने अपनी पुस्तक 'करीक्युलम प्रोसेस (Curriculum Process) में आधुनिकतम स्थिति और दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के कुछ महत्त्वपूर्ण मानदण्ड प्रस्तावित किये हैं। व्हीलर द्वारा प्रस्तावित मानदण्ड के अनुसार शैक्षिक उद्देश्यों को पाँच दृष्टियों से सार्थक होना चाहिए -

1. मानवीय अधिकारों से तादात्म्य (Related with Human Rights), 

2. लोकतान्त्रिक दृष्टि से अनुकूलित (Democratic View).

3. सामाजिक दृष्टि से सार्थक (Social Significance), 

4. वैयक्तिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए प्रवृत्त (Intended to Satisfy Individual Needs).

5. सन्तुलन (Balance) 


1. मानवीय अधिकारों से तादात्म्य (Relationship with Human Rights)

संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय अधिकारों के सार्वभौम घोषणा पत्र की धारा 50 के अन्तर्गत मानव को समाज के सदस्य के रूप में नागरिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में अनेक अधिकार प्रदान किये गये हैं तथा इन्हें सभी राष्ट्रों के सभी व्यक्तियों के लिए समान मानक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस घोषणा पत्र का महत्त्व इसलिए और भी अधिक है क्योंकि विश्व इतिहास में सम्भवतः पहली बार संगठित अन्तर्राष्ट्रीय समाज ने सभी देशों के व्यक्तियों के अधिकारों का सार्वभौमिक दायित्व वहन किया है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी देश में भी व्यक्ति के व्यवहार किया जाता है, वह केवल उस समाज एवं सरकार का मामला न होकर पूरे विश्व समाज का मामला हो गया है।

चूँकि शिक्षा मानव-उत्थान का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है। अतः मानव समाज को संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र की धारा 55 के अनुसार निम्नांकित बातों की अनिवार्य रूप से व्यवस्था करनी चाहिए:-

(1) उच्च जीवन स्तर, पूर्ण कार्य आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति तथा विकास की स्थितियाँ

(2) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य एवं अन्य सम्बद्ध समस्याएँ तथा अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सहयोग ।।

(3) सभी के मानवीय अधिकारों तथा मौलिक स्वतन्त्रता के प्रति जाति, धर्म, भाषा एवं लिंग-भेद के बिना सार्वभौमिक समादर।

चूँकि घोषणा-पत्र में घोषित अधिकारों एवं स्वतन्त्रता को अभी मानव समाज के एक बड़े भाग के लिए प्राप्त करना है। अतः प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों तथा दूसरों के प्रति उसके दायित्वों को शिक्षा के अन्तिम लक्ष्यों के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इन अधिकारों का ज्ञान, अनुभवों तथा कार्यों रूप में मानव सम्बन्धों के विभिन्न क्षेत्रों (शिक्षालय, परिवार, समाज राष्ट्र एवं विश्व) में समझे जाये जिससे इनके पक्ष में उचित अभिवृत्तियाँ विकसित हो सकें।

इस घोषणा पत्र की धारा 20 शिक्षा से सम्बन्धित है। इसके अनुसार शिक्षा मानव व्यक्तित्व के पूर्ण विकास तथा मानवीय अधिकारों एवं मूलभूत स्वतन्त्रता के प्रति समादर को सशक्त बनाने के लिए निर्दिष्ट होनी चाहिए। शिक्षा ही सभी राष्ट्रों जातियों एवं धार्मिक वर्गों के मध्य सहनशीलता, सद्भाव तथा मित्रता की वृद्धि करेगी तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की शान्ति स्थापना के प्रयासों को सफल बनायेगी। चूँकि ये अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के व्यापक लक्ष्य है. इनके सार्वभौम क्षेत्र हैं तथा ये मानव से मानव के रूप में सम्बन्धित है। अतः किसी भी राष्ट्र के लक्ष्य तब तक पर्याप्त नहीं माने जा सकते जब तक कि वे इस घोषणा पत्र के अनुरूप न हो।

उपर्युक्त विचार 14 देशों के विशिष्ट विद्वानों एवं शिक्षाविदों की समिति ने स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार नवीन खतरों के कारण आज के विश्व में जीवन के लिए उचित प्रकार की शिक्षा का निर्धारण करना बहुत कठिन हो गया है। अतः लोगों को विभिन्न प्रकार के नवीन कौशलों का ज्ञान तो दिया ही जाना चाहिए तथा इसके साथ ही वर्तमान जटिल समाज में सफल जीवन के लिए आवश्यक अभिवृत्तियों तथा मूल्यों को छोटे समूहों से बड़े तक तथा अन्त में सम्पूर्ण विश्व समुदाय में प्रचारित करने के मार्ग खोजना भी शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए। बालकों को यह सिखाना आवश्यक है कि देश की नागरिकता तथा राष्ट्रीयता की भावना का वैश्विक दृष्टिकोण के साथ तादात्म्य होता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा से राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान पहुँच सकता है। 


2. लोकतान्त्रिक दृष्टि से अनुकूलन (Democratic Dealing)

शिक्षा के उद्देश्यों का समाज के आदर्शों से घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहिए। वर्तमान समय में विश्व के अधिकांश राष्ट्रों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रचलित मान्यता के अनुसार शिक्षा के वैध उद्देश्य केवल प्रजातान्त्रिक सिद्धान्तों से ही प्राप्त किये जा सकते हैं, क्योंकि प्रजातन्त्र ही वह व्यवस्था है जिसमें सभी मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं की सही ढंग से पूर्ति की जा सकती है। 

इस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं:-

(1) प्रत्येक व्यक्ति के महत्त्व और उसकी गरिमा का समादर किया जाता है।

(2) प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं का अधिकतम विकास करने तथा दूसरों के विकास में सहयोगी बनने के समान अवसर प्राप्त होते हैं।

(3) सामान्य जनता द्वारा स्वतन्त्र रूप से व्यक्त की गई सहमति से सरकार का निर्माण होता है तथा सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। 

(4) व्यक्तिगत भिन्नता का समादर किया जाता है तथा उन्हें प्रोत्साहित और विकसित भी किया जाता है।

(5) प्रत्येक व्यक्ति को अपने विवेक बुद्धि अथवा अन्तरात्मा के अनुसार विचार करने, बोलने, लिखने-पढ़ने तथा पूजा-अर्चना की स्वतन्त्रता होती है तथा उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दूसरों की इसी प्रकार की स्वतन्त्रता में बाधक न बने, बल्कि उसका पोषक बनें। अतः शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण को समाहित करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


3. सामाजिक सार्थकता (Social Significance)

शैक्षिक उद्देश्य, लोकतान्त्रिक दृष्टि से अनुकूलित होने चाहिए किन्तु इससे ही उनकी सामाजिक सार्थकता सिद्ध नहीं होती है। परम्परागत एवं स्थिर समाज में शिक्षा के उद्देश्य वर्तमान मूल्यों को परिलक्षित करने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी वैध हो सकते हैं, किन्तु परिवर्तनशील समाज में पूर्व-निर्धारित शैक्षिक लक्ष्यों का वर्तमान समय में सार्थक होना आवश्यक नहीं होता है। हो सकता है कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास कर रही हो जो वास्तव में वर्तमान समय में विद्यमान ही नहीं है और कुछ अन्य नवीन आवश्यकताएँ उत्पन्न हो गई हो जिनकी पूर्ति शिक्षा द्वारा नहीं हो पा रही हो। अतः यह आवश्यक है कि शैक्षिक उद्देश्यों की वर्तमान सार्थकता के साथ-साथ उनमें भावी आवश्यकताओं के पूर्वाभास का भी समावेश किया जाता रहना चाहिए।

पाठ्यक्रम के सतत संशोधन एवं संवर्धन के द्वारा बालकों द्वारा प्राप्त किये जा रहे ज्ञान की समयानुकूलता के बारे में आश्वस्त तो हुआ जा सकता है किन्तु इतना ही पर्याप्त नहीं है। वर्तमान समाज में परिवर्तन की गति इतनी अधिक तीव्र है कि दो पीढ़ियों में तो बहुत अधिक अन्तर आ ही जाता है, एक ही पीढ़ी के विभिन्न चरणों में कई नवीन परिवर्तनों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए वह शिक्षा जो वर्तमान शिक्षक को तैयार करने का साधन थी. अब सम्भवत उसके द्वारा पढ़ाये जाने वाले बालकों के लिए प्रभावी नहीं हो पा रही है।

यदि हम यह नहीं जानते कि बालकों को भविष्य में किन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा तो हम उनके लिए उपयुक्त समाधान भी नहीं बता सकते हैं। वर्तमान समय में यही सबसे बड़ी कठिनाई है। भविष्य के बारे में यदि कुछ निश्चित बात कही जा सकती है तो वह यही होगी कि भविष्य वर्तमान से मित्र होगा। अतः बालकों को यह बताना और समझाना आवश्यक है कि वे परिवर्तन की सम्भावनाओं को स्वीकार करने के लिए सतत् तत्पर रहें। उन्हें वर्तमान और भावी समस्याओं को पहचानने सूचनाएँ एकत्र करने तथा सहयोगी बनकर समस्याओं के समाधान के प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बालकों में ऐसे सामाजिक मूल्य एवं निष्ठा विकसित करने में सहायता की जानी चाहिए जिनके माध्यम से वे विभिन्न प्रस्तावित समाधानों का सही मूल्यांकन कर सकें। इसके लिए उनमें वर्तमान को विश्लेषित करने तथा उससे समायोजन स्थापित करने के साथ-साथ भावी समाज के बारे में सोचने तथा उपयुक्त योजना बनाने की क्षमता विकसित की जानी चाहिए।

अभी तक हमारी शिक्षा का प्रमुख झुकाव प्रायः प्राचीन संस्कृति पर ही रहा है किन्तु नवीन व्यवसायों के साथ-साथ शिक्षा सभी को उपलब्ध कराने के भी अपने निहितार्थ है। वर्तमान तकनीकी समाज में विशेषज्ञीकरण और ज्ञान का सूक्ष्म से सूक्ष्मतर विभाजन करने की स्व-प्रवृत्ति है। इसको सन्तुलित करने के लिए ऐसे सामान्य सिद्धान्तों के विकास की आवश्यकता है जो एक से अधिक क्षेत्रों के लिए सार्थक हो तथा बहुमुखी एवं विभिन्न दिशा-मुखी वर्गों का एकीकरण कर सके।

वर्तमान समय में तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परातकनीकी का जो विकास हो रहा है उसके लिए अभी हमने शिक्षा को उपयुक्त स्वरूप प्रदान करने की समुचित तैयारी नहीं की है। आज इसकी सबसे बड़ी आवश्यकता है। शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण में हमें इन बातों पर ध्यान देना होगा तभी हम शिक्षा को सामाजिक सार्थकता प्रदान कर सकेंगे। 


4. वयक्तिक आवश्यकताएँ (Individual Needs)

वैयक्तिक एवं सामाजिक आवश्यकताएँ बहुत अधिक सीमा तक एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इनमें मुख्य अन्तर मात्र सुविधा का है। एक विद्वान के अनुसार इन दोनों में प्रायः वही सम्बन्ध है जो किसी पदार्थ के परमाणु तथा उसके प्रोटान, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन में होता है। पाठ्यक्रम आयोजकों को वैयक्तिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में निम्नांकित बिन्दुओं का ध्यान दिया जाना चाहिए:-

1. किसी बालक की प्राथमिक आवश्यकता उसे व्यक्ति के रूप में स्वीकार किये जाने की है। इसका तात्पर्य यह है कि बालक की प्रकृति, व्यक्तित्व, शारीरिक एवं बौद्धिक भेदों को समझते हुए व्यक्तिगत भेदों को स्वीकार किया जाये। अतः बालक को अपनी गति से विकसित होने की स्वतन्त्रता प्रदान की जानी चाहिए। व्यक्तिगत भिन्नताओं के साथ-साथ प्रत्येक आयु वर्ग के सामान्य लक्षणों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

2. मानव में सुरक्षा की भावना स्वाभाविक है तथा सामाजीकरण की प्रक्रिया में इसका बहुत महत्त्व है। बालकों के कुसमायोजन का एक प्रमुख कारण असुरक्षा की भावना है। बालक अपने माता-पिता तथा अन्य लोगों से स्नेह के सम्बन्ध में आश्वस्त होना चाहता है। निश्चित रूप से बालक की सुरक्षा का सर्वप्रथम दायित्व परिवार का है किन्तु शिक्षालयों की भी इस हेतु अपनी भूमिका है। अतः शिक्षालयों को इस कार्य में परिवार एवं समाज को सहायता प्रदान करनी चाहिए।

3. बालक में इस भावना का विकास किया जाना चाहिए कि वह जीवन के किसी-न-किसी क्षेत्र में अवश्य सफल हो सकता है।

4. प्रत्येक बालक अपने कार्य की पुष्टि एवं मान्यता चाहता है। शिक्षा द्वारा की गई पुष्टि तथा मान्यता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। बालक प्रायः अपने वर्ग के सदस्य के रूप में कार्य करना चाहता है। उदाहरणार्थ, वह खेलना चाहता है, प्रतियोगिता करना चाहता है, नेतृत्व करना चाहता है तथा सृजनात्मक कार्य करना चाहता है आदि-आदि। शिक्षालयों को इस कार्य में उन्हें योग प्रदान करना चाहिए।

5. पाठ्यक्रम निर्माताओं को बालकों की दो प्रकार की आवश्यकताओं पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए:-

(i) स्व की आवश्यकताएँ अर्थात् वे आवश्यकताएँ जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती है।

(ii) वे आवश्यकताएँ जो प्रौढ़ लोगों के अनुसार बालकों के लिए आवश्यक है जैसे-शारीरिक एव मानसिक स्वास्थ्य, जीवन के विभिन्न पक्षों के लिए तैयारी आदि।


5. सन्तुलन (Balance)

सन्तुलन से तात्पर्य शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण करते समय पूर्व वर्णित चारों बिन्दुओं पर समुचित बल प्रदान करना है अर्थात् किसी एक बिन्दु पर आवश्यकता से अधिक बल नहीं दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए विगत कुछ वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि शिक्षा में सूचनात्मक ज्ञान पर बहुत अधिक तथा एकांगी भाव से बल दिया जा रहा है जो कि त्रुटिपूर्ण है। शैक्षिक उद्देश्यों की किसी भी सूची को तभी सन्तोषप्रद कहा जा सकता है जब वह सभी पक्षों की दृष्टि से सन्तुलित हो। अतः पाठ्यक्रम निर्माताओं को शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण में सभी आवश्यक पक्षों को ध्यान में रखते हुए उनमें सन्तुलन बनाये रखने का प्रयास करना चाहिए।

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